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Friday, February 13, 2015

सुप्तवज्रासन (Supt Vajrasana)



विधिः 

१.      वज्रासन में बैठकर हाथों को पाश्व भाग में रखकर उनकी सहायता से शरीर को पीछे झुकाते हुए भूमि पर सर को टिका दीजिये। घुटने मिले हुए हों तथा भूमि पर ठीके हुए हों। 
२.      धीरे-धीरे  कंधो,ग्रीवा एवं पीठ को भूमि पर टिकाने का प्रयत्न कीजिये।  हाथों को जंघाओं पर सीधा रखे। 
३.      आसन को छोड़ते समय कोहनियों एवं हाथों का सहारा लेते हुये वज्रासन में बैठ जाइए। 




लाभ:

१.      इस आसन से पेट के निचे वाला भाग खींचता है जिससे बड़ी आंत सक्रीय होने से कोष्ठबद्धता मिटती है। 
२.      नाभि का टलना दूर करता है , गुर्दो के लिए भी लाभप्रद है। 

Sunday, November 23, 2014

दिर्घ नौकासन

दिर्घ नौकासन(Dirgh navkasan)

 विधि:
१.     शवासन  में लेटकर दोनों हाथों को सिर के पीछे मिलाते हुए सिधा कर दें। 
२.     श्वास अन्दर  भरकर पैर,सिर एवं हाथ तीनों धीरे-धीरे करीब एक फुट ऊपर उठाइए नितम्ब एवं पीठ का निचला भाग भूमि पर लगा रहे। वापस आते समय श्वास छोड़ते समय धीरे-धीरे  हाथ,पैर सीर को भूमि पर
टिकाईये। 

लाभ: 
१.     पेट तथा  पीठ के लिए लाभदायी है। 
२.     हदयको मजबूत बनाने वाला श्रेष्ठ आसन है। 
३.     स्त्रीयो के लिए ये आसन उत्तम है -यह उनकी देह को सुडौल  बनता है।