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Monday, February 2, 2015

हेल्थ टिप फॉर पाचन- (Helth Tip Digestion)

          खाना खाने के बाद पेट मे खाना पचेगा या खाना सड़ेगा ये जानना बहुत जरुरी है ...हमने रोटी खाई,हमने दाल खाई,हमने सब्जी खाई, हमने दही खाया लस्सी पी ,दूध,दही छाझ लस्सी फल आदि|,ये सब कुछ भोजन के रूप मे हमने ग्रहण कियाये सब कुछ
हमको उर्जा देता है और पेट उस उर्जा को आगे ट्रांसफर करता है |पेट मे एक छोटा सा स्थान होता है जिसको हम हिंदी मे कहतेहै"अमाशय"उसी स्थान का संस्कृत नाम है "जठर"|उसी स्थान को अंग्रेजी मे कहते है"epigastrium "|ये एक थेली की तरह होता हैऔर यह जठर हमारे शरीर मे सबसेमहत्वपूर्ण है क्योंकि सारा खाना सबसे पहले इसी मे आता है।ये बहुत छोटा सा स्थान हैं इसमें अधिक से अधिक 350 GMS खाना आ सकता है |हम कुछ भी खाते सब ये अमाशय मे आ जाता है|आमाशय मे अग्नि प्रदीप्त होती है उसी को कहते हे"जठराग्न"।|ये जठराग्नि है वो अमाशय मे प्रदीप्त
होने वाली आग है ।ऐसे ही पेट मे होता है जेसे ही आपने खाना खाया की जठराग्नि प्रदीप्त हो गयी |यह ऑटोमेटिक है,जेसे ही अपने रोटी का पहला टुकड़ा मुँह मे डाला की इधर जठराग्नि प्रदीप्त हो गई|ये अग्नि तब तक जलती हे जब तक खाना पचता है |अब अपने खाते ही गटागट पानी पी लिया और खूब ठंडा पानी पी लिया|और कई लोग तो बोतल पे बोतल पी जाते है |अब जो आग (जठराग्नि) जल रही थी वो बुझ गयी|आग अगर बुझ गयी तो खाने की पचने की जो क्रिया है वो रुक गयी|अब हमेशा याद रखें खाना जाने पर हमारे पेट में दो ही क्रिया होती है,एक क्रिया है जिसको हम
कहते हे"Digestion" और दूसरी है "fermentation"फर्मेंटेशन का मतलब है सडना और डायजेशन का मतलब हे पचना|आयुर्वेद के हिसाब से आग जलेगी तो खाना पचेगा,खाना पचेगा तो उससे रस बनेगा|जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस,मज्जा,रक्त,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा|ये तभी होगा जब खाना पचेगा|यह सब हमें चाहिए|ये तो हुई खाना पचने की बातअब जब खाना सड़ेगा तब क्या होगा..?खाने के सड़ने पर सबसे पहला जहर जो बनता है वो हे यूरिक एसिड (uric acid )|कई बार आप डॉक्टर के पास जाकर कहते है की मुझे घुटने मे दर्द हो रहा है,मुझे कंधे-कमर मे दर्द हो रहा है तो डॉक्टर कहेगा आपका यूरिक एसिड बढ़ रहा है आप ये दवा खाओ, वो दवा खाओ यूरिक एसिड कम करो|और एक दूसरा उदाहरण खाना जब खाना सड़ता है, तो यूरिक एसिड जेसा ही एक दूसरा विष बनता है जिसको हम कहते हे LDL (Low Density lipoprotive) माने खराब कोलेस्ट्रोल (cholesterol )|जब आप ब्लड प्रेशर(BP) चेक कराने डॉक्टर के पास जाते हैं तो वो आपको कहता है (HIGH BP )हाई-बीपी है आप पूछोगे कारण बताओ?तो वो कहेगा कोलेस्ट्रोल बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ है |आप ज्यादा पूछोगे की कोलेस्ट्रोल कौनसा बहुत है ?तो वो आपको कहेगा LDL बहुत है |इससे भी ज्यादा खतरनाक एक विष हे वो है VLDL (Very Low Density lipoprotive)|
ये भी कोलेस्ट्रॉल जेसा ही विष है।अगर VLDL बहुत बढ़ गया तो आपको भगवान भी नहीं बचा सकता| खाना सड़ने पर और जो जहर बनते है उसमे एक ओर विष है जिसको अंग्रेजी मे हम कहते है triglycerides| जब भी डॉक्टर आपको कहे की आपका "triglycerides" बढ़ा हुआ हे तो समज लीजिए की आपके शरीर मे विष निर्माण हो रहा है |तो कोई यूरिक एसिड के नाम से कहे,कोई कोलेस्ट्रोल के नाम से कहे, कोई LDL -VLDL के नाम से कहे समझ लीजिए की ये विष हे और ऐसे विष 103 है |ये सभी विष तब बनते है जब खाना सड़ता है |मतलब समझ लीजिए किसी का कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे ध्यान आना चाहिए की खाना पच नहीं रहा है ,कोई कहता हे मेरा triglycerides बहुत बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट मे डायग्नोसिस कर लीजिए आप ! की आपका खाना पच नहीं रहा है |कोई कहता है मेरा यूरिक एसिड बढ़ा हुआ है तो एक ही मिनिट लगना चाहिए समझने मे की खाना पच नहीं रहा है |क्योंकि खाना पचने पर इनमे से कोई भी जहर नहीं बनता|खाना पचने पर जो बनता है वो है
मांस,मज्जा,रक्त ,वीर्य,हड्डिया,मल,मूत्र,अस्थि और खाना नहीं पचने पर बनता है यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल,LDL-VLDL|और यही आपके शरीर को रोगों का घर बनाते है !पेट मे बनने वाला यही जहर जब ज्यादा बढ़कर खून मे आते है ! तो खून दिल की नाड़ियो मे से निकल नहीं पाता और रोज थोड़ा थोड़ा कचरा जो खून मे आया है इकट्ठा होता रहता है और एक दिन नाड़ी को ब्लॉक कर देता है *जिसे आप heart attack कहते हैं !तो हमें जिंदगी मे ध्यान इस बात पर देना है की जो हम खा रहे हे वो शरीर मे ठीक से पचना चाहिए और खाना ठीक से पचना चाहिए इसके लिए पेट मे ठीक से आग (जठराग्नि) प्रदीप्त होनी ही चाहिए| क्योंकि बिना आग के खाना पचता नहीं हे और खाना पकता भी नहीं है महत्व की बात खाने को खाना नहीं खाने को पचाना है |आपने क्या खाया कितना खाया वो महत्व नहीं हे।खाना अच्छे से पचे इसके लिए वाग्भट्ट जी ने सूत्र दिया !!"भोजनान्ते विषं वारी"
--------------- (मतलब खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है ) * इसलिए खाने के तुरंत बाद पानी कभी मत पिये!*अब आपके मन मे सवाल आएगा कितनी देर तक नहीं पीना ???तो 1 घंटे 48 मिनट तक नहीं पीना !अब आप कहेंगे इसका क्या calculation हैं ??बात ऐसी है !
जब हम खाना खाते हैं तो जठराग्नि द्वारा सब एक दूसरे मे मिक्स होता है और फिर खाना पेस्ट मे बदलता हैं है !पेस्ट मे बदलने की क्रिया होने तक 1 घंटा 48 मिनट का समय लगता है !उसके बाद जठराग्नि कम हो जाती है !
(बुझती तो नहीं लेकिन बहुत धीमी हो जाती है )पेस्ट बनने के बाद शरीर मे रस बनने की परिक्रिया शुरू होती है !तब हमारे शरीर को पानी की जरूरत होती हैं ।तब आप जितना इच्छा हो उतना पानी पिये !!जो बहुत मेहनती लोग है (खेत मे हल चलाने वाले ,रिक्शा खीचने वाले पत्थर तोड़ने वाले)
उनको 1 घंटे के बाद ही रस बनने लगता है उनको घंटे बादपानी पीना चाहिए !अब आप कहेंगे खाना खाने के पहले कितने मिनट तक पानी पी सकते हैं ???तो खाना खाने के 45 मिनट पहले तक आप पानी पी सकते हैं !
अब आप पूछेंगे ये मिनट का calculation ???? बात ऐसी ही जब हम पानी पीते हैं तो वो शरीर के प्रत्येक अंग तक जाता है !और अगर बच जाये तो 45 मिनट बाद मूत्र पिंड तक पहुंचता है !तो पानी - पीने से मूत्र पिंड तक आने का समय 45 मिनट का है !तो आप खाना खाने से 45 मिनट पहले ही पाने पिये !पानी ना पीये खाना खाने के बाद।इसका जरूर पालण करे !

Friday, December 5, 2014

अनुलोम-विलोम प्राणायाम (ANULOM-VILOM PRANAYAM)



      दाएँ हाथ को उठकर दाएँ  हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दायाँ स्वर तथा अनामिका व् मध्यमा अंगुलियों के द्वारा बायाँ स्वर बन्द करना चाहिए। हाथ की हथेली नासिका के सामने न रखकर थोड़ा ऊपर रखना चाहिए।
विधि:
      अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाए नासिका से प्रारम्भ करते है। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी  नासिका को बंध करके बाई नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर ,अनामिका व् मध्यमा से वामश्वर को बन्ध  करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-पश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व् बाहर निकाले व् अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द,मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण  की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाए नाक से श्वास पूरा अन्दर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाए नाक को बन्द करके बाए नासिका से श्वास बाहर छोड़ने  चाहिए। यह एक प्रकियापुरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करे फिर पुनः प्राणायाम करे। इस प्रकार तीन मिनिट से प्रारम्भ करके  इस प्राणायाम को १० मिनिट तक किया जा सकता है।
लाभ:
१.      इस प्राणायम से बहत्तर करोड़,बहत्तर लाख,दस हजार दो सौ दस नाड़ियाँ परिशुद्ध हो जाती है।
२.     संधिवात,कंपवात,गठिया,आमवात,स्नायु-दुर्बलता आदि समस्त वात रोग,धातुरोग,मूत्ररोग शुक्रक्षय ,अम्लपित्त ,शीतपित्त आदि समस्त पित्त रोग,सर्दी,जुकाम,पुराना नजला,साइनस,अस्थमा,खाँसी,टान्सिल  समस्त रोग दूर होते है।
3.     इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से तीन-चार माह में ३०% लेकर ५०% तक ब्लोकेज खुल जाते है। कोलेस्ट्रोल,एच. डी. एल. या एल. डी. एल. आदि की अनियमितताएं दूर हो जाती है। इस प्राणायाम से तन,मन,विचार छ संस्कार सब परिशुद्ध होते है। 

IN ENGLISH:



    Right by the right hand thumb up tone and ring finger of the right hand middle finger by expenditure should stop tone left. Slightly with the palm of the hand should not be in front of the nostrils.

 Method: 
     Start with the left nostril breathing is morganatic-inverse. The left thumb ligament through the right nostril breathing through the nose to fill in gradually. To fill in the full breath, left middle finger expenditure Shwar bound to be left out of the right nasal breathing complete. Slow pace of breathing Pswas should moderate and intense. Fill in full force with rapid breathing expenditure excluded persons with breathing deceleration according to his power, to moderate and intense. Supplemental fast, sharp sound of life is to laxative. Left off exit tone full breath taking full breaths in through the nose to fill the inside of the right to complete and close the right and left nostril breathing nose should drop out. It was a Prkiapuri. This method will thus remain constant. Then again when stressed to a rest in between to pranayama. Thus, starting from three minutes to 10 minutes and can be done in this pranayama.

Benefits:

1. Seven hundred and twenty million of the Pranayam, 7.2 million, ten thousand two hundred ten nerves are accurate.

 2. Rheumatoid,Nervous system And all gout, Nephrology,pyrosis, urticaria and all gall disease,cold, chronic catarrh, sinus, asthma, cough, Tonsil all diseases are away.


3. The regular practice of pranayama, ranging from 30% to 50% in three to four months is open Blokej. Cholesterol, H. D. L. Or l. D. L. Etc. irregularities are away. This pranayam body, mind, consider all six rites are accurate.